स्वामी विवेकानंद का अंतिम वाराणसी आगमन , और गोपाल लाल विला .

विवेकानंद ने अपना शरीर त्यागने से कुछ दिन पहले अपने आराध्य शिव की नगरी में जहाँ कुछ समय बिताया. ( गोपाल लाल विला) राजा काली कृष्ण ठाकुर का garden house

स्वामी जी के अंतिम दिनों  का साक्षी उनका निवास स्थल गोपाल लाल विला वर्तमान मे एक खण्डहर बन चुका है .

वाराणसी स्वामी विवेकानंद के प्रिय भगवान शंकर की नगरी है , स्वामी जी यहाँ पहले भी आते रहे थे परन्तु इस बार सन 1902 में उनका वाराणसी में आने का प्रायोजन स्वास्थ्य लाभ लेना था।

ये अलग बात है की स्वामी जी अपने को यहाँ भी जन -हित के विषयों से स्वयं को अलग न कर सके और गंभीर बीमारी की अवस्था में भी समाज सेवा के कार्यों जुड़े रहे.

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स्वामी विवेकानंद का अंतिम वाराणसी आगमन और गोपाल लाल विला में ठहरना.

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         L.T कॉलेज का प्रवेश द्वार.

प्रवेश द्वार पर स्वामी विवेकानंद के लगे पोस्टर एक -दो वर्ष पुराने हैं।
इसके अतिरिक्त स्वामी विवेकानंद के यहाँ प्रवास के संबंध में कोई जानकारी नहीं दी गयी है।

वाराणसी नगर कचहरी के निकट अर्दली बाजार में L. T कॉलेज परिसर स्थित है।
वर्तमान में इस परिसर के अंदर , एक पुस्तकालय , एक प्राइमरी स्कूल , शिक्षा विभाग से जुड़े घर अक्षय पात्र मेगा किचन और एक पुराना मंदिर भी है।

वर्तमान में L. T COLLEGE के नाम से जाने जाने वाली ये जगह कभी राजा काली कृष्ण ठाकुर का Garden House (गार्डन हाउस) था। राजा काली कृष्ण ठाकुर के पिता जी का नाम गोपाल लाल था। इस भवन का निर्माण संभवतः उन्हीं के द्वारा करवाया गया था।

GARDEN HOUSE (गार्डन हाउस)

GARDEN HOUSE (गार्डन हाउस) 19 वीं शताब्दी के आरंभ और मध्य में वाराणसी में भारत कुछ प्रमुख राजाओं , व्यापारियों , के द्वारा विस्तृत भूमि पर विशाल भवनों का निर्माण कार्य करवाया गया था। ये सभी भवन एक बगीचे जैसे भूमि के मध्य स्थित होते थे इस कारण इन्हें गार्डन हाउस कहा जाता था।

उस दौर के वाराणसी में स्थित कुछ अन्य प्रमुख गार्डन हाउस

उस दौर में निर्मित कुछ गार्डन हाउस आज भी वाराणसी में देखे जा सकते हैं जैसे — काशी नरेश की नदेसरी कोठी , हथुआ नरेश की कोठी , नेपाल नरेश की कोठी , डालमिया भवन आदि।

राजा काली कृष्ण ठाकुर के गार्डन हाउस के मध्य स्थित एक सुन्दर और विशाल कोठी स्थित थी जिसे गोपाल लाल विला के नाम से जाना जाता था।

स्थानीय लोग इस भवन को सोंधा बास के नाम से भी जानते थे।

1902  मे विवेकानंद  का आना एक  दूसरा अर्थ रखता था, अब वो स्वामी विवेकानंद विश्वप्रसिद्ध ,दार्शनिक और विद्वान थे, परन्तु बेहद कमज़ोर और बीमार.

बंगाल के प्रसिद्ध लेखक शंकर ने अपनी किताब The monk  as man में chapter 4पेज 175 ,176  मे  उनकी 31 बिमारियों के बारे मे और  इन बिमारियों से दृहता से लड़ते हुए  सामाजिक भलाई मे लगे रहने का जिक्र  किया है.  

स्वामी जी इस बार बनारस आ कर  राजा  काली  कृष्ण ठाकुर  के गार्डन हाउस गोपाल लाल  विला  मे रुके .

स्थानीय लोग  इस जगह  को सोंधा बास  भी कहते थे .  यहाँ विवेकानंद जी लगभग एक महीना तक रुके .राजा  काली  कृष्ण ठाकुर  के गार्डन हाउस गोपाल लाल  विला  का अपने पत्रो मे जिक्र करते हुए इस स्थान को स्वास्थ्य के अनुकूल बताया था .

स्वास्थ्य  ख़राब होने के बाद भी यहाँ  सामाज़िक  गतिविधियों मे लगे लोगों से मिलते रहे  स्वामी जी से प्रभावित हो कर “दरिद्र नारायण सेवा समिति” “poor men’s relief association”  का गठन करने वाले चारु चंद्र दास,(स्वामी शुभानन्दा) सदाशिवनन्द (आप ही ने स्वामी जी की इस बार बनारस में आगवानी की और गोपाललाल विला में उनके प्रवास के बारे मे स्वामी विवेकानंद संस्मरण नाम से एक लेख लिखा) .

चारु चंद्र दास, जी लगभग प्रतिदिन स्वामी जी से मिलने गोपाल लाल भवन आया करते थे . आप लोगों के अनुरोध पर स्वामी जी ने संगठन का नाम” the Ramakrishna home of service”  कर दिया जो आगे चल कर वाराणसी का एक प्रमुख अस्पताल बना।

आज ये अस्पताल रामकृष्ण अस्पताल के नाम से विख्यात है और ये वाराणसी नगर का एक प्रमुख अस्पताल है। स्थानीय लोग इसको कौड़िया अस्पताल के नाम से भी जानते हैं। समाज सेवा मे लगे राजा भिनगा उदय प्रताप से भी उनके गार्डन घर पर जा कर मिले.  केदार घाट के पुजारी से भी मुलाकात की.

यहाँ से जाने के कुछ महीनों बाद ही(4july 1902) स्वामी जी मृत्यु हो गयी.

स्वामी जी के अंतिम दिनों  का साक्षी उनका निवास स्थल वर्तमान मे गोपाल लाल विला एक खण्डहर बन चुका है .क्या ही अच्छा होता की सरकार भारत की सांस्कृतिक राजधानी (cultural capital of India) वाराणसी मे इस खण्डहर को एक धरोहर रूप प्रदान करती.

भारत की सांस्कृतिक राजधानी मे  भारत की संस्कृति को बचाने वाले और सम्पूर्ण विश्व को भारत की संस्कृति से परिचित कराने वाले योद्धा सन्यासी (warrior monk) विवेकानंद की इस धरोहर को बचाने का प्रयास तो होना ही चाहिए.

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स्वामी विवेकानंद ने गोपाल लाल विला का ज़िक्र कहाँ किया है.

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स्वामी विवेकानंद ने स्वयं गोपाल लाल विला में रुकने और अपने अंतिम बार बनारस आने का जिक्र अपने अनेकों पत्रों में किया है। स्वामी विवेकानंद ने गोपाल लाल विला में ठहरने के दौरान विभिन्न लोगों को पत्र लिखे थे अथवा लोगों के पत्रों का उत्तर दिया था।

इन पत्रों में स्वयं स्वामी विवेकानंद ने गोपाल लाल विला उल्लेख किया है।

कोई भी व्यक्ति जिसकी इस विषय में रूचि हो वो स्वामी विवेकानंद के THE COMPLETE WORKS OF SWAMI VIVEKANANDA में उनके द्वारा वर्णित इस स्थान का वर्णन पढ़ सकता है।

THE COMPLETE WORKS OF SWAMI VIVEKANANDA ADVAITA ASHRAM KOLKATA द्वारा प्रकाशित है।

नोट :- ब्रिटिश शासन काल में वाराणसी को बनारस के नाम से जाना जाता था।

स्वामी विवेकानंद ने गोपाल लाल विला में ठहरने का जिक्र सर्वप्रथम 7 फ़रवरी 1902 में एक पत्र में किया है।

स्वामी विवेकानंद ने ये पत्र जोसेफिन मैकलियोड (Josephine MacLeod ) को लिखा था। इस पत्र के साथ दिए Foot -Note से पता चलता है की स्वामी जी का गोपाल लाल भवन में आगमन 4 फ़रवरी 1902 को हुआ था।

जोसेफिन मैकलियोड स्वामी विवेकानन्द की शिष्या थीं। इनका भारत से गहरा लगाव था। स्वामी विवेकानंद इन्हें टैंटीने अथवा जो उपनाम से संबोधित करते थे। इस पत्र में भी स्वामी इन्हें जो संबोधन किया है।

स्वामी विवेकानंद ने इस पत्र में अपने सकुशल वाराणसी पहुँचने का जिक्र किया है।

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गोपाल लाल विला में जब हुआ स्वामी जी को अपनी मृत्यु का पूर्वाभास .

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स्वामी जी ने अपनी एक अन्य शिष्या भगिनी निवेदिता को जिनका वास्तविक नाम मूल नाम ‘मार्गरेट एलिजाबेथ नोबल’ था को 4 मार्च 1902 में लिखे एक पत्र में अपनी बिमारियों का जिक्र किया था।
इस पत्र में भी गोपाल लाल विला का जिक्र है।

स्वामी जी ने भगिनी निवेदिता लिखे अपने पत्र में बताया है की उन्हें बैठने लिखने में समस्या हो रही है।
स्वामी जी निवेदिता को लिखी चिट्ठी में बताते हैं की उनकी तबियत ठीक है पर कभी भी बिगड़ सकती है।

स्वामी जी ने अपने सदा बुखार बने रहने और सांस लेने में होने वाली तकलीफ का जिक्र भी किया है

स्वामी विवेकानंद इस पत्र में निवेदिता से स्पष्ट कहते हैं की ये पत्र लिखते समय उनको ऐसा लग रहा है की शायद ये उनका अंतिम पत्र हो।

एक चित्रकार (KRIPA) की कल्पना GOPAL-LAL VILA (1902)

वाराणसी के युवा चित्रकार कृपा द्वारा 1902 में गोपाल लाल भवन कैसा दिखता रहा होगा का काल्पनिक भव्य रूप।

वर्तमान में गोपाल लाल विला