स्वामी विवेकानंद के अंतिम दिनों का साक्षी गोपाल लाल विला चित्रों के माध्यम से।

भारतवर्ष के पुनर्जागरण के अग्रदूत , हिन्दू धर्म के मूल सिद्धांतों से सम्पूर्ण विश्व को परिचित कराने वाले , पश्चिमी देशों को प्रथम बार योग से परिचय कराने वाले स्वामी विवेकानंद ने अपने आराध्य शिव की नगरी वाराणसी में अपने प्राण त्यागने से पहले लगभग एक महीना व्यतीत किया था।

स्वामी विवेकानंद के वाराणसी प्रवास का साक्षी रहा गोपाल लाल विला आज खंडहर में बदल चुका है।

गोपाल लाल विला की बदहाली भारत के लोगों के इतिहास भूलने की आदत का भी जीता जागता सबूत है।



वाराणसी नगर के अर्दली बाजार मोहल्ले में कॉलेज ऑफ़ टीचर एजुकेशन (College Of Teacher Education ) नामक संस्था का प्रांगण स्थित है।
स्थानीय निवासी इस स्थान को L.T कॉलेज के नाम से जानते हैं।

ब्रिटिश राज के दौरान ये स्थान राजा काली कृष्ण ठाकुर का गार्डन हाउस( Garden House) था। इस गार्डन हाउस में स्थित भवन को गोपाल लाल विला के नाम से जाना जाता था .

सन 1902 में 4 फरवरी को स्वामी विवेकानंद का इस स्थान पर आना हुआ था।

ये बड़े आश्चर्य का विषय है की विवेकांनद सम्बंधित कोई जानकारी संस्थान के मुख्य द्वार पर नहीं दी गयी है।

विवेकानंद के दो चित्र जरूर मुख्य द्वार पर देखे जा सकते हैं ये चित्र भी स्थानीय लोगों के द्वारा लगाए गए हैं।

             वर्तमान में गोपाल लाल विला भवन।

इस भवन की वर्तमान स्थिति देख कर विश्वास नहीं होता की ये भारतीय इतिहास की एक बहुमूल्य धरोहर है।
इस भवन के खंडहरों में नशेड़ियों का जमघट देख कर ऐसा लगा की इस भवन के इतिहास को न सिर्फ लोगों ने विस्मृत कर दिया है वरन प्रशासन भी इस भवन के प्रति पूरी तरह से उदासीन है।

स्वामी विवेकानंद गोपाल लाल विला में निवास के दौरान इस भवन की भव्यता से प्रभावित हुए थे और इस भवन के कमरों को बेहद सुन्दर और अलंकृत बताया था।

स्वामी विवेकानंद ने इस भवन में निवास के दौरान अपनी शिष्या Josephine Macleod को लिखे एक पत्र में गोपाल लाल विला के भव्य स्वरुप का वर्णन किया है।

स्वामी विवेकानंद के अनुसार

THIS HOUSE IS NICE — WELL FURNISHED AND HAS A GOOD MANY ROOMS AND PARLOURS .

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स्वामी विवेकानंद के द्वारा गोपाल लाल विला में सन 1902 में महीने भर के प्रवास के दौरान गोपाल लाल विला के वर्णन और वर्तमान में गोपाल लाल विला की स्थिति की तुलना .

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वर्तमान में गोपाल लाल विला भवन की छत पूरी तरह से खत्म हो चुकी है। सुंदर और सुसज्जित कमरे लगभग पूरी तरह नष्ट हो चुके हैं। आज इस भवन को देख कर यकीन करना भी मुश्किल जान पड़ता है की स्वामी विवेकानंद ने इस भवन की सुंदरता की प्रशंसा की थी।

कभी इन कमरों की सुंदरता का जिक्र स्वामी विवेकानंद के द्वारा किया गया था। जो वर्तमान में लगभग पूरी तरह से नष्ट हो चुके हैं। ईमारत की दीवार पर जिस प्रकार से पेड़ पौधे उग आए हैं की गोपाल लाल विला देखने में एक भूतिया ईमारत जान पड़ती है।

गोपाल लाल विला के सामने इस स्थान पर गुलाब का उद्यान था। वर्तमान में किसी भी प्रकार का कोई उद्यान इस प्रांगण में नहीं है।

विशाल वृक्षों से ये स्थान आच्छादित था। आज भी इस स्थान पर विशालकाय वृक्षों की बहुतायत है परन्तु देखभाल के अभाव में वृक्षों ने एक जंगल का सा रूप ले लिया है।

प्रांगण में स्थित प्राचीन पांचू बीर मंदिर और स्वामी विवेकानंद के प्रवास के कारण ये स्थान को पवित्र मान कर विनोबा भावे ने भी इसी स्थान पर ध्यान का अभ्यास किया था। ऐसा प्रतीत होता है की गोपाल लाल विला से कुछ दूरी पर निर्मित कुछ कमरे संभवतः वही स्थान है जहाँ विनोबा भावे रहा करते होंगे।

गोपाल लाल विला ईमारत से सटे प्राइमरी स्कूल के अंदर एक कमरे में लगा शिलापट्ट।

इस शिलापट्ट पर स्वामी विवेकानंद के गोपाल लाल विला में 1902 में ठहरने का उल्लेख है।
स्थानीय लोगों के अनुसार स्वामी विवेकानंद की याद में ही इस स्थान पर इस प्राइमरी स्कूल का निर्माण कार्य संपन्न हुआ था।

सबसे दुःखद पहलू है गोपाल लाल विला के सामने शौचालय का निर्माण।

इस पूरे प्रांगण में जगह की कोई कमी नहीं है पर हाल के वर्षों में गोपाल लाल विला के ठीक सामने पब्लिक शौचालय का निर्माण करा कर शासन वर्ग द्वारा ये संदेश देने का प्रयास किया जा रहा है की विवेकानंद और उनकी शिक्षाओं को शासन वर्ग द्वारा कितना महत्त्व दिया जा रहा है।

चिराग तले अँधेरा

गोपाल लाल विला के ठीक सामने निर्मित शौचालय को देखने के बाद इस शिलापट्ट को देख कर किसी का मन भी खिन्न हो सकता है।

आधुनिक भारत के महानतम योद्धा सन्यासी स्वामी विवेकानंद ने मृत्यु के कुछ दिन पूर्व जिस स्थान पर निवास किया था उस स्थान की इतनी घोर उपेक्षा और वो भी तब जब प्रदेश की बागडोर एक योगी के हाँथ में हो।

भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी जो स्वयं को विवेकानंद के विचारों से प्रभावित बताते हैं और वाराणसी से सांसद भी हैं।

यहीं नहीं नरेंद्र मोदी वाराणसी में चुनाव लड़ते समय गोपाल लाल विला से थोड़ी दूर पर स्थित विवेकानंद की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया था। इस प्रांगण में ही बने अक्षय पात्रा मिड डे मील किचन का विजिट भी किया था . इस अवसर पर प्रधानमंत्री , मुख्यमंत्री दोनों लोग उपस्थित थे।

वाराणसी के युवा चित्रकार कृपा द्वारा 1902 में गोपाल लाल भवन कैसा दिखता रहा होगा का काल्पनिक भव्य रूप।

कारण जो भी हो इस स्थान की घोर उपेक्षा किसी के दिल में भी भारतीय शासन व्यवस्था के प्रति हिकारत का भाव जगाती है।

यहाँ से जाने के कुछ महीनों बाद ही(4july 1902) स्वामी जी मृत्यु हो गयी.

स्वामी जी के अंतिम दिनों  का साक्षी उनका निवास स्थल वर्तमान मे गोपाल लाल विला एक खण्डहर बन चुका है .

क्या ही अच्छा होता की सरकार भारत की सांस्कृतिक राजधानी(cultural capital of India) वाराणसी मे इस खण्डहर को एक धरोहर रूप प्रदान करती, भारत की सांस्कृतिक राजधानी मे  भारत की संस्कृति को बचाने वाले और सम्पूर्ण विश्व को भारत की संस्कृति से परिचित कराने वाले योद्धा सन्यासी (warrior monk) विवेकानंद की इस धरोहर को बचाने का प्रयास तो होना ही चाहिए.

वाराणसी  का पुराना नाम काशी है जिसका अर्थ होता है प्रकाश.  

यहाँ प्रकाश का अर्थ ज्ञान से है कृत्रिम प्रकाश से नहीं. मालवीय जी ने भी वाराणसी को सर्व विद्या की राजधानी कहा था.

गौतम बुद्ध महावीर स्वामी, कबीर, तुलसी, न जाने कितनो को इस शहर ने प्रभावित  किया देश ही नहीं विदेश मार्क ट्वेन,  स्टीव जॉब्स, जॉर्ज हैरिसन इस शहर से प्रेरणा लेते रहे. इस प्रकार से न जाने  कितने अनगिनत व्यक्तियों  प्रेरणा देने वाले शहर मे अनगिनत व्यक्तियों को प्रेरित करने वाले व्यक्ति का स्मारक  एक  पुनीत कार्य(holy work) होगा और ये स्वामी जी के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि.(tribute)                                  

गोपाल लाल विला में जब हुआ स्वामी जी को अपनी मृत्यु का पूर्वाभास .

गोपाल लाल विला और स्वामी विवेकानंद से जुड़े अन्य बातों को जानने के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें : https://nithinks.com/2019/01/11/vivekanandawarrior-monkvaranasi/

Author: nitinsingh

Postgraduate in International relations. Experience in writing in various journals, from BBC WORLD NEWS SERVICE to India's one of the oldest hindi daily. I like to write on international relations, religion, religious conflict. Social media has bridged the distance between writing and reading. Now writing is not just the expression of one's own thought, but also knowing the expression of people on various subject.

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